राजेश कुमार सिद्धार्थ का उदय : संघर्ष से नेतृत्व तक

राजेश कुमार सिद्धार्थ का उदय : संघर्ष से नेतृत्व तक

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद की धरती ने अनेक सामाजिक आंदोलनों और जननेताओं को जन्म दिया है, लेकिन हाल के वर्षों में जिस नाम ने गांव–गांव, खेत–खलिहानों और श्रमिक बस्तियों तक अपनी पहचान बनाई, वह है राजेश कुमार सिद्धार्थ। इनका राजनीतिक और सामाजिक सफर एक साधारण कार्यकर्ता से जनप्रिय नेता बनने तक का प्रेरक उदाहरण है।

राजेश कुमार सिद्धार्थ ने हमेशा अपने संघर्ष की शुरुआत जमीन से की। उनका मानना रहा कि “अगर लोकतंत्र का असली चेहरा देखना है, तो विधान भवन नहीं, विकास भवन जाओ।” यही कारण है कि उन्होंने अब तक 1500 से अधिक बार विकास भवन सीतापुर के सामने धरना प्रदर्शन करके इतिहास रच दिया। यह कोई आंकड़ा मात्र नहीं, बल्कि उस जिद, साहस और जनसेवा का प्रतीक है जिसने एक व्यक्ति को आंदोलन का पर्याय बना दिया।

उनके आंदोलनों के केंद्र में हमेशा समाज के वे तबके रहे जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति अक्सर भूल जाती है — दलित, किसान, मजदूर और महिलाएं। वे कहते हैं, “लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देना नहीं, बल्कि अपनी आवाज़ को सत्ता के दरवाजे तक पहुँचाना है।” इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक विकास परिषद की स्थापना की। इस संगठन ने प्रदेश के विभिन्न जिलों — कुशीनगर, लखीमपुर खीरी, इटावा, कानपुर, औरैया, सिद्धार्थ नगर और लखनऊ — में गरीबों और वंचितों की आवाज़ को शक्ति दी।

समाज में अन्याय के खिलाफ उनका संघर्ष सिर्फ धरना–प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यह समझ लिया था कि दलित–किसान आंदोलन को स्थायी रूप से प्रभावशाली बनाने के लिए संगठनात्मक और वैचारिक दोनों मोर्चों पर मजबूती चाहिए। इसी सोच से उन्होंने “डॉ. अंबेडकर संवैधानिक महासंघ” का गठन किया — एक ऐसा सामाजिक संगठन जो संविधान की रक्षा और बाबा साहेब के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए समर्पित है। महासंघ ने यह नारा दिया: “संविधान बदलने वालों को वहां तक पहुँचने न दो।” यह नारा धीरे-धीरे पूरे प्रदेश में लोकतंत्र प्रेमियों का घोष बन गया।

राजेश कुमार सिद्धार्थ का नेतृत्व केवल आंदोलनकारी नहीं, बल्कि विचारधारात्मक भी है। वे बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम जी के विचारों को आत्मसात कर चुके हैं। उनका मानना है कि “सत्ता परिवर्तन से पहले चेतना परिवर्तन आवश्यक है।” इसी चेतना को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने ‘बहुजन संगठक’ समाचार पत्र का संपादन 2010 में संभाला। यह वही ऐतिहासिक पत्र है जिसे मान्यवर कांशीराम साहब ने बहुजन समाज की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रारंभ किया था। राजेश कुमार सिद्धार्थ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मीडिया को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।

उनकी संघर्ष यात्रा केवल सामाजिक न्याय तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिए भी आवाज़ उठाई। एक दशक के भीतर उन्होंने 10,000 से अधिक पत्रकारों को एक मंच पर लाने का कार्य किया — जो भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए एक बड़ा कदम माना जाता है।

राजेश कुमार सिद्धार्थ का राजनीतिक और सामाजिक योगदान इस बात से स्पष्ट होता है कि उन्होंने हर अवसर पर संविधान की मर्यादा, लोकतंत्र की आत्मा और सामाजिक समानता की भावना को सर्वोपरि रखा। वर्ष 2024 में उन्होंने लखनऊ विधानसभा के सामने 75 रथों की यात्रा निकालकर बाबा साहेब अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के सपनों को साकार करने की दिशा में ऐतिहासिक शुरुआत की। उसी यात्रा ने एक नारा दिया — “संविधान बचाओ, अधिकार पाओ।”

उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि किसान कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश महासचिव और बाद में प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया। लेकिन यह पद उनके लिए गंतव्य नहीं, बल्कि संघर्ष का एक और पड़ाव था। वे मानते हैं कि “किसानों की आज़ादी केवल खेतों में नहीं, बल्कि नीति निर्माण में तय होगी।”

उनकी जनप्रियता का सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 2024 और 2025 की बाबा साहेब जयंती पर दीपोत्सव आयोजन हैं। उन्होंने 14 अप्रैल 2024 को 25 लाख दीप और 2025 में 26 लाख दीप ज्योति जलाकर सामाजिक चेतना की नई रोशनी फैलाई। इसके अतिरिक्त 29 जनवरी 2025 को मास्टरबाग, सीतापुर से निकले 1000 संविधान रथों की ऐतिहासिक यात्रा ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

राजेश कुमार सिद्धार्थ का सफर यह प्रमाणित करता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल भाषणों से नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष और संगठन से संभव है। वे आज दलितों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं के प्रिय नेता बन चुके हैं, क्योंकि उनका नेतृत्व जनपद से शुरू होकर जनमानस तक पहुँच चुका है।

यदि डॉ. अंबेडकर ने दलितों को संविधान का अधिकार दिया, और मान्यवर कांशीराम ने उन्हें राजनीतिक चेतना दी, तो राजेश कुमार सिद्धार्थ ने उस चेतना को आंदोलन में बदलने का काम किया है।