राजेश कुमार सिद्धार्थ को “गरीबों के मसीहा” कहना एक दृष्टिकोण है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस नज़रिए और किन कामों के आधार पर उनका मूल्यांकन करते हैं।
अगर हम सामान्य रूप से देखें, तो किसी व्यक्ति को गरीबों का मसीहा तब कहा जाता है जब वह—
गरीब, वंचित और हाशिये पर रहने वाले लोगों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करे,
उनके मुद्दों को प्रशासन और समाज के सामने उठाए,
धरना, प्रदर्शन, जनसभा या अन्य आंदोलनों के माध्यम से दबे-कुचले वर्ग की आवाज़ बने,
व्यक्तिगत लाभ से ज़्यादा जनहित को प्राथमिकता दे।
यदि राजेश कुमार सिद्धार्थ ने वास्तव में ऐसे कार्य किए हैं—जैसे कि दलितों, पिछड़ों, किसानों, मज़दूरों या ज़रूरतमंदों के लिए लगातार काम—तो बहुत से लोग उन्हें गरीबों का मसीहा मानते हैं।

