भूमिका – दलित-किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सामाजिक न्याय और समानता की लड़ाई उतनी ही पुरानी है, जितनी इस देश की सभ्यता। सदियों से चली आ रही जातिगत असमानता, भूमि-वंचना और आर्थिक शोषण ने भारत के समाज को दो हिस्सों में बाँट दिया — एक तरफ़ वे जो सत्ता और संसाधनों पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं, और दूसरी तरफ़ वे, जिन्हें संविधान ने अधिकार तो दिए, पर सत्ता-प्रणाली ने उन तक उनका लाभ नहीं पहुँचने दिया। यही विभाजन आगे चलकर “दलित आंदोलन”, “किसान आंदोलन” और “मज़दूर चेतना” के रूप में उभरा।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जब संविधान बनाया, तो उन्होंने न केवल समानता और स्वतंत्रता की नींव रखी बल्कि वंचित तबकों को राजनीतिक शक्ति में भागीदारी दिलाने की ठोस व्यवस्था की। किंतु संविधान के क्रियान्वयन के बाद भी ग्रामीण भारत में दलितों, किसानों और मज़दूरों को हक़ नहीं मिला। ज़मीन का स्वामित्व कुछ वर्गों तक सीमित रहा, खेतों में मेहनत करने वाले अब भी बंधुआ श्रमिक की तरह जीवन बिताते रहे।
ऐसे में 20वीं सदी के उत्तरार्ध में मान्यवर कांशीराम साहब ने डॉ. अंबेडकर के अधूरे मिशन को राजनीतिक धरातल पर उतारने का बीड़ा उठाया। उन्होंने कहा था — “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी”। इसी विचार ने दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों में एक नई चेतना जगाई। उन्होंने समझाया कि अधिकार मांगने से नहीं, बल्कि संगठित होकर संघर्ष करने से मिलते हैं।
21वीं सदी में, जब बहुजन राजनीति धीरे-धीरे सत्तारूढ़ दलों के दबाव में सीमित होती चली गई, तब कुछ युवाओं ने फिर से इस चेतना को जगाने का संकल्प लिया। इसी पृष्ठभूमि में उभरते हैं — राजेश कुमार सिद्धार्थ, जो न केवल सीतापुर जनपद में बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में दलितों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं की आवाज़ बनते जा रहे हैं।
वह दौर जब आम जनता का विश्वास राजनीति से डगमगा रहा था, राजेश कुमार सिद्धार्थ ने उसे फिर से सड़कों पर लाकर बताया कि लोकतंत्र केवल संसद की कुर्सियों से नहीं, बल्कि जनता के संघर्ष से ज़िंदा रहता है। उनका आंदोलन न केवल स्थानीय समस्याओं का प्रतिनिधित्व करता है बल्कि डॉ. अंबेडकर और कांशीराम के सपनों की व्यावहारिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है — “संविधान की रक्षा और समाज में भागीदारी ही सच्चा लोकतंत्र है।”

