विकास की मार्ग का नाम है सिद्धार्थ लखनऊ डॉ अम्बेडकर संवैधानिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सभी को संबोधित करते हुए

विकास की मार्ग का नाम है सिद्धार्थ लखनऊ डॉ अम्बेडकर संवैधानिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सभी को संबोधित करते हुए कहा मनुष्य के विकास के मार्ग का नाम है सिद्धार्थ ,बुद्ब के बताये हुये रास्ते पर चलने से सभी का विकास संभव सभी साथियों को जयभीम, नमों बुद्धाय! इंसान बनने का शुभ अवसर! सदाचारी इंसान बनों !! ‌‌ बुद्ध की ओर चलो!!! त्रिगुणी बुद्ध पूर्णिमा यथार्थ में मानवता दिवस है आज, संपूर्ण विश्व को मानवता के मौलिक मूल्यों (शिक्षा, सुरक्षा ,समृद्धि, सम्मान, ओर समुचित संतुलित आहार,) ओर मानवीय अनुभूतियों (समता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व, न्याय) को प्रदान करने वाले, महामानव तथागत गौतमबुद्ध भगवान का न केवल जन्म हुआ था,वर्ण आज ही सम्यक सम्बोद्धि भी प्राप्त हुयी थी तथा आज के ही दिन महापरिनिर्वाण हुआ था। आज हम सब को तथागत गौतमबुद्ध जी के चार आर्य सत्यों को हृदयंगम कर, उन्हें अपने आचरण में लाने का संकल्प लेना चाहिए। . …दुःख है,तो दुःख का कारण भी होगा,कारण है,तो निवारण भी है,ओर निवारण का मार्ग भी है,जिस पर हमें स्वयं चलना होगा, “अप्प दीपो भव “*यही है तथागत गौतमबुद्ध जी के चार आर्य सत्य जिनके कारण तथागत गौतमबुद्ध जी जगत गुरु कह लाते हैं। वैज्ञानिक टैम्प्रामेंट का यही आधार है। यथार्थ में हमारे दुःखों का कारण अविधा है, भ्रांति है, असत्य को सत्य मान लेना ही हमारे दुख का कारण है।हम अपनी प्रकृति प्रदत्त बुद्धि को, शिक्षा से परिमार्जित कर के,उसका सद् उपयोग नहीं करते हैं। तभी तथागत गौतमबुद्ध जी ने त्रिसरण के रास्ते पर चलने को कहा है। 1.बुद्धं सरणं गच्छामि। ‌ बुद्धि के मार्ग पर चलो। *शिक्षित होकर , दूसरों को भी शिक्षित करों ! 2.धम्मं सरणं गच्छामि।_ धम्म के मार्ग पर चलो। अपना कर्तव्य करों, संघर्ष करो!! 3..संघं सरणं गच्छामि। संध के मार्ग पर चलो। संगठित हो!!!। कभी भी बैर, बैर से समाप्त नहीं होता है,अबैर से बैर समाप्त होता है।यही सनातन धम्म है। हमारा राष्ट्र आज विप्लव काल से गुजर रहा है यह बुद्ध की शान्ति से परे, युद्ध में उलझ गया हैं। यथार्थ में हमारा देश दो मूल वर्गों में बांट गया है। एक अल्प संख्यक शोषक वर्ग,दूसरा बहुसंख्यक मूलनिवासियों का शोषित वर्ग,। क्या यह उचित है कि एक इंसान दूसरे इंसान का शोषण करें? इंसान को इंसान का ,शोषक नहीं होना चाहिए, अगर कोई इंसान अपने जैसे इंसान का शोषण करता है तो बह इंसान नहीं हो सकता हैं,बह निश्चित रूप से दो पाई पशु है। दूसरा जो व्यक्ति किसी अपने जैसे इंसान से शोषित होकर चुप रहता है, चुपचाप शोषण सहन करता है , शोषण के विरुद्ध संघर्ष नहीं करता वह भी पशु समान है। अतः शोषण करने वाला ओर शोषण सहने वाले , दोनों दोषी हैं, दोनों इंसान नहीं हो सकते, दोनों मानवीय जीवन यापन नहीं कर रहे हैं। आज भारत, जो बुद्ध का राष्ट्र है, मानवीय दुर्गुणों के युद्ध का देश हो गया है। आज हम सबको पंचशील (अनावश्यक हिंसा से विरत, झूठ बोलने से विरत, चोरी करने से विरत,जुआ तथा नशावृत्ति से विरत, व्यभिचार से विरत) को हृदयंगम कर उसे अपने आचरण में प्रांण-प्रण से उतारने का संकल्प लेना चाहिए। हम इंसान बनें!। ओर अपने राष्ट्र भारत महान को, शोषण मुक्त, (न कोई शोषण करने वाला हो न ही कोई शोषण सहने बाला हो) प्रज्ञा शील, प्रबुद्ध, इंसानों के रहने योग्य, इंसानों का राष्ट्र बनाने ,हेतु संकल्पित होंना चाहिए । सभी साथियों को त्रिगुणी बुद्ध पूर्णिमा की मंगल कामनाएं। भवतुसब्बमंगलम्

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