“तेरी हिम्मत कैसे हुई ब्राह्मणों की बारात में आने की..❓”,


इस घटना ने ज्योतिबा फुले को बना दिया क्रांतिकारी
महात्मा फुले के बाल्यकाल की जातिवादी अपमान की घटना जिसने उनके भीतर सामाजिक क्रांति की चिंगारी जलाई,

भारतीय इतिहास में हाशिए के समाज के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले असाधारण व्यक्तित्व के महान नायक महात्मा ज्योतिबा फुले के बचपन में एक ऐसी घटना घटी जिसके बाद से उनके अन्तःकरण में जातिवाद, ब्राह्मणवाद, अन्धविश्वास, आडम्बरों के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन शुरू करने की प्रेरणा जगी.

ज्योतिबा को उनके सहपाठी परांजपे के ब्याह का निमंत्रण पत्र मिलता है. उस पर लिखा होता है कि, “तुम नहीं आए तो कुट्टी?’ [अगर तुम नहीं आए तो दोस्ती ख़त्म हो जाएगी.]

सहपाठी के ब्याह का निमंत्रण पत्र देख फुले ख़ुशी से बारात जाने के लिए सजने-सवरने लगते हैं. उन्हें तैयार होता देख उनके पिता गोविन्दराव पूछते हैं, “कहीं जा रहे हो?”

फुले कहते हैं, “बताया था न! परांजपे के विवाह की बारात में जाने का न्योता मिला है.”

बारात जाने के लिए बेटे का उत्साह देख गोविन्दराव को ब्राह्मणों की बारात के कुछेक अपमानित करने वाले प्रसंग याद आ जाते हैं. जो कांटे की तरह अन्दर ही अन्दर चुभ रहे थे. लेकिन बेटे ज्योतिबा के उत्साह पर पानी डालना उन्होंने उचित नहीं समझा.

ढोल-ताशे, पिपिहरी के गहगहाते बोल के साथ बारात चल चुकी थी. लड़के नाचने-गाने में मशगूल थे. परांजपे दूल्हा बना मुकुट पहने तलवार साढ़े रथ पर बैठा है, बगल में उसका छोटा भाई भी है.

ज्योतिबा का मन किया कि परांजपे से मिला जाए. तभी पता चला कि गोला, आतिशबाजी दागने वाले पाटिल का पता नहीं है, लोगों में फुसफुसाहट चल रही हैं कि अब गोला कौन दागे? गोलों का दगना भी उस समय जरुरी था. नाचते-गाते लड़कों से पूछा गया कि, “गोला दाग लोगे?” कईयों ने कहा, “डर लगता है.”

तभी फुले आगे बढ़कर कहते हैं, “मुझे डर नहीं लगता.” वह गोला लेकर आगे बढ़ते हैं फिर लौटकर मशाल से बारात के आगे गोले दागना शुरू का देते हैं.”

उसी दौरान एक त्रिपुंडधारी, तिलकित पग्गड़धारी, जो सबको माला पहना रहा था ज्योतिबा के सामने खड़ा हो गया. बोला, “तू…?”

फुले ठहर गए. उसने पूछा “गोविन्दराव गोन्हे का मुलगा [बेटा] न?”

फुले ने जवाब दिया, “जी!”

तुरंत जैसे वह फुले पर बरस पड़ता है. बोला, “तेरी हिम्मत कैसे हुई ब्राह्मणों की बारात में आने की?”

फुले, “निमंत्रण दिया था!”

त्रिपुंडधारी, “हुंह निमंत्रण! उसने (परांजपे) जो किया सो किया, लेकिन तू कैसे भूल गया कि तू शूद्र है और यह ब्राह्मणों की बारात है. तेरी मति मारी गई थी. तू ब्राह्मणों के बराबर कब से हो गया?”

तभी को दयालु ब्राह्मण टोकता है, “अब जाने भी दीजिए, मुलगा है, मित्र समझकर मुलगे ने अपने दोस्त को बुला लिया, सो आ गया बेचारा! दोनों ही बच्चे ठहरे. गोला भी तो इसी ने….”.

“बालक समझकर माफ़ कर दीजिये. कोई रास्ता निकालिए.”

पग्गड़धारी, “ठीक है, तो सबसे पीछे चला जाए वहां..! जहां रामोशी [सामाजिक रूप से एक निम्न जाति] और सामान ढोने वाले पीछे-पीछे आ रहे हैं.

ज्योतिबा उनके बगल में जाकर खड़ा हो गया. एकदम अपमानित महसूस करते हुए!

बारात से अलग खड़ा एक रामोशी पास आता है. बोला, “तुम्हें बारात से निकाल दिया ब्राह्मणों ने न? तुम आए ही थे क्या सोचकर? भूल गए वे पुराने दिन जब बाभन लोग शूद्रों और अछूतों से कैसा व्यवहार करते थे? जाओ, घर जाओ बच्चे! यह माला तुम्हारे लिए नहीं, बाजे तुम्हारे लिए नहीं, मशाले धूप-धूनी, जलसा तुम्हारे लिए नहीं. तुम शूद्र हो! शूद्र! जलसे से बांह पकड़कर बाहर निकाले गए.”

ज्योतिबा घर लौटे. गोविन्दराव ने बेटे का लटका चेहरा देखा, “क्या हुआ? गए नहीं?”

बेटे ने सारी आपबीती सुनाई. अपमान की दास्तान सुनते रहे पिता और देखते रहे बेटे के स्याह हो आए चेहरे को. उन्हें अपना अपमानित अतीत याद आया, बोले, “तुम्हें मना करना चाहा था! मगर तुम्हारा मन टूट जाएगा — यह सोचकर चुप रह गया.” थोड़ा रूककर फिर बोले, “उन्होंने तुम्हें मारा-पीटा नहीं, दंड नहीं दिया — यह क्या कम है बेटा! गलती तुम्हारी थी, गए क्यों?”

“लेकिन”, ज्योतिबा की आंख भर आई. गोविन्दराव ने सँभालते हुए तुरंत कहा, “ना बेटे, ना! हम उनकी बराबरी कैसे कर सकते हैं? कहां वो ब्राह्मण, कहां हम शूद्र!”

ज्योतिबा का घायल मन बार-बार छटपटा रहा था. तभी पेड़ के पीछे छुपा रामोशी टोकता है, “तुम आए ही क्यों थे ब्राह्मणों की बारात में? मैं तो नहीं जाता.”

“यह पूर्व जन्म का फल है कि वे ब्राह्मण होकर जन्मे, तुम शूद्र होकर, और मैं रामोशी बनकर. क्या कर लोगे?” उसने कहा.

उस दिन की भारी रात बड़ी मुश्किल से बीती. फुले के जीवन में व्यक्तिगत रूप से यह शायद पहली घटना थी जिसने उन्हें अंतःकरण को झकझोर दिया.

  • राजेश कुमार सिद्धार्थ अध्यक्ष डॉ आंबेडकर संवैधानिक महासंघ एवं किसान कांग्रेस प्रदेश महासचिव
    [9:53 AM, 5/7/2025] पापा: आने वाली पीढ़ियां क्या अंधविश्वास,पाखंडवाद से निकल पाएंगी?

मेरे दिमाग में बार-बार यही प्रश्न उठता है कि क्या आने वाली पीढ़ी अंधविश्वास और पाखंड से निकल कर वैज्ञानिक चेतना जगा पायेगा? क्या वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज का निर्माण हो पायेगा? ये सवाल का जवाब खोजने का बहुत कोशिश करता हूँ। इस अंधविश्वास की दलदल से लोगों को कौन निकालेंगे? बहुत से महामानव ने जन्म लिए और अंधविश्वास, पाखंड और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आजीवन संघर्ष किये और लोगों को यह समझाते हुए चल बसे की मत पड़ पाखंड में बंधु, लेकिन लोग आज वैज्ञानिक युग में भी यह नहीं समझ पाया कि अंधविश्वास एक अफीम है। यह मन, शरीर के साथ अपने बच्चे और आने वाली पीढ़ी को भी बर्बाद कर देता है।

अंधविश्वास बहुत पुरानी मानसिक बीमारी है, इसीलिए कई बार मुझे लगता है ठीक नहीं हो पायेगा, लेकिन फिर भी मन नहीं मानता और मुझे ऐसा लगता है, देर ही सही, लेकिन लोग समझेंगे और बदलाव जरूर होगा। कब तक सत्य से दूर रह सकेंगे। कब तक झूठ का पर्दाफाश नहीं होगा। वास्तविकता सामने आने पर एक दिन लोगों को झूठ को त्यागकर सत्य में ही वापस आना पड़ेगा। आज भागदौड़ की जिंदगी में युवाओं के पास समय का बहुत अभाव है। एक तरफ घर-परिवार और दूसरी तफर जीवन-यापन के लिए नौकरी-पेशा। लोग दिनभर की हरारत से परेशान होने की वजह से कुछ सोचने की स्थिति में नहीं रहते। किसी को सुनने के लिए फुर्सत नहीं होती, लेकिन आस्था और धर्म के नाम पर कथा सुनने के लिए समय जरूर मिल जाते हैं, नहीं मिला तो नौकरी से छूट्टी लेकर पाखंडी कथावाचक को सुनने पहुँच जाते हैं, क्योंकि लोग काल्पनिक चीजों से डर जाते हैं।

स्वर्ग-नर्क, ये नहीं करोगे तो पाप पड़ेगा या ऐसे करने से सब पाप धूल जाएगा। दूसरा उस पाखंडी की बातों में आकर लालच में पड़ जाते हैं, उसके चरणस्पर्श से ही सब मनोकामना पूर्णा हो जाएगी, ऐसा लगता है जिसकी औलाद नहीं है वे बच्चे पाने के लालच में जाते है और जब औलाद है तो उसकी पढ़ाई को लेकर और पढ़ाई हो गयी तो अच्छी नौकरी के लिए, अच्छे घर में शादी हो ऐसे बहुत सी कामनाएं होती हैं। इसी का फायदा उठाकर पाखंडी बाबा आप लोगों की आँख में धूल झोकर बेवकूफ बना कर निकल लेता है। लाखों, करोड़ों की कमाई कर लेता है और आपको क्या मिलता है? कुछ भी नहीं। सब मेहनत की कमाई को हराम के खाने वाला ले जाता है, बच्चों की दवाई, पढ़ाई के लिए कुछ नहीं बचता और जिंदगी भर किस्मत को कोसते रहते हैं। तमाम अंधविश्वास फैलाने वाली फिल्म, लेख, साहित्य, उद्दीपक पर प्रतिबन्ध करना होगा और लोगों को बेहतर शिक्षा, प्रगतिशील साहित्य और अच्छी फ़िल्में उपलब्ध कराना होगा, तभी धीरे-धीरे ही सही, लेकिन क्रांति होगी, लोग समझेंगे और बेहतर समाज का निर्माण करेंगे। इसी तर्क के साथ आने वाली पीढ़ी अंधविश्वास से निकले इसके लिए हम अंधविश्वास का पर्दाफाश लगातार करते रहेंगे।

अंधविश्वास, रूढ़िवाद व तमाम कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करें और बेहतर समाज बनाने के लिए संघर्ष करें।

*✒️ राजेश कुमार सिद्धार्थ अध्यक्ष डॉ आंबेडकर संवैधानिक महासंघ एवं किसान कांग्रेस प्रदेश महासचिव

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